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Tuesday, 31 May 2016

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धरती के करीब लाल ग्रह: मंगल






मंगल सौर मण्डल में सूर्य से बुद्ध, शुक्र तथा पृथ्वी के बाद चौथा ग्रह है। पृथ्वी से देखने पर इसकी आभा रक्तिम दिखाई देती है इसी वजह से इसे लाल ग्रह के नाम से भी जाना जाता है। मंगल की सूर्य से औसत दूरी लगभग 23 करोड़ कि॰मी॰ और कक्षीय अवधि 687 (पृथ्वी) दिवस है। मंगल पर सौर दिवस एक पृथ्वी दिवस से मात्र थोड़ा सा लंबा है : 24 घंटे, 39 मिनट और 35.244 सेकण्ड। एक मंगल वर्ष 1.8809 पृथ्वी वर्ष के बराबर या 1वर्ष, 320 दिन और 18.2 घंटे है। मंगल का अक्षीय झुकाव 25.19 डिग्री है, जो कि पृथ्वी के अक्षीय झुकाव के बराबर है। परिणामस्वरूप, मंगल की ऋतुएँ पृथ्वी के जैसी है, हालांकि मंगल पर ये ऋतुएँ पृथ्वी पर से दोगुनी लम्बी है। 
अन्य ग्रहों की भांति मंगल भी दीर्घवृत्ताकार कक्षा मे सूर्य की परिक्रमा करता है। इसी वजह से इसकी दूरी पृथ्वी से बदलती रहती है। इसके अलावा ग्रहों विशेषकर ब्रहस्पति का गुरुत्व खिंचाव भी इसके परिक्रमा मार्ग पर आंशिक असर डालता है। पृथ्वी से इसकी सबसे निकटतम दूरी 5.46 करोड़ किलोमीटर होती है जब कि अधिकतम दूरी 40 करोड़ किलोमीटर तक हो जाती है । वर्ष 2003 में मंगल ग्रह धरती के बेहद करीब आया था। तब पृथ्वी से इसकी दूरी मात्र 5.57 करोड़ किलोमीटर दर्ज की गई थी। ऐसा दुर्लभ नज़ारा पिछली बार 60 हजार वर्ष पूर्व हुआ था। भविष्य मे ऐसी करीबी स्थिति वर्ष 2287 में बनेगी।
अयोध्या में मंगल ग्रह को देखते हुए डॉ आर. एस. कनौजिया, कामेश मणि पाठक, इनरमल, महेश, सुशील कुमार, पूनम तथा लावण्या (दाहिने से बायें) 30 मई, 2016, 9:40 पी एम
इस बार फिर, इस वर्ष 8 मई से लेकर 3 जून तक मंगल ग्रह पृथ्वी के काफ़ी नजदीक से गुजरेगा। इस दौरान 30 मई को रात 9:36 पी एम पर यह पृथ्वी के सबसे नजदीक होगा। इस समय पृथ्वी और मंगल के बीच दूरी महज़ 7.53
करोड़ किलोमीटर रह जाएगी। अगली बार यह नजारा  31 जुलाई, 2018 को दिखेगा।

Tuesday, 10 May 2016

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बुद्ध परागमन ( Transit of Mercury)






जब बुद्ध ग्रह (मर्करी) सूर्य तथा पृथ्वी के मध्य से गुजरता है तो वह सूर्य की डिस्क पर एक काले बिन्दु के रूप मे दिखाई देता है। इसे घटना को ही  बुद्ध परागमन कहते हैं। अंग्रेजी मे इसे Transit of Mercury कहा जाता है। इसकी तुलना 06 जून, 2012 मे पड़े वीनस ट्रांज़िट से की जा सकती है। इसे सर्वप्रथम फ्रेंच खगोलशास्त्री पियरे गैसेंडी ने 07 नवम्बर, 1631 मे देखा था। हालांकि इस घटना का सटीक अनुमान केपलर साहब ने पहले ही लगा लिया था परन्तु इसे देखने के लिए वे जीवित नहीं रहे। एक सदी मे इस प्रकार के लगभग 13-14 मर्करी ट्रांजिट पड़ते हैं। यह संख्या वीनस ट्रांजिट की तुलना मे कहीं अधिक है इसका कारण मर्करी का सूर्य से अपेक्षाकृत पास होना है। इस सदी के कुल 14 ट्रांजिट मे से अब तक केवल 02 ट्रांसिट (07 मई, 2003; 08 नवम्बर, 2006) ही हुए हैं जब कि 12 मर्करी ट्रांजिट होने शेष हैं जिनकी तिथियां इस प्रकार हैं-  09 मई, 2016; 11 नवम्बर, 2019; 13 नवम्बर, 2032; 07 नवम्बर, 2039; 07 मई, 2049; 09 नवम्बर, 2052; 10 मई, 2062; 11 नवम्बर, 2065; 14 नवम्बर, 2078; 07 नवम्बर, 2085; 08 मई, 2095 तथा 10 नवम्बर, 2098। विगत 10 वर्षों में यह पहला मौका है जब हम आज (09 मई, 2016) इस घटना के साक्षी बन रहे है। इसके बाद अगला ट्रांजिट 11 नवम्बर, 2019 को होगा लेकिन भारत में सूर्यास्त होने की वजह ये नहीं दिखेगा। भारत मे यह नजारा 16 वर्षों बाद 13 नवम्बर, 2032 को ही देखा जा सकेगा। विश्वपटल पर 09 मई, 2016 को पड़ने वाले ट्रांजिट की स्थिति को निम्न मानचित्र द्वारा समझा जा सकता है।
 विश्वपटल पर ट्रांजिट ऑफ मर्करी (09 मई, 2016)
ज्योतिष मे मर्करी ट्रांजिट के महत्व के संदर्भ में पंडित श्री कामेश मणि पाठक कहते हैं कि सूर्य तथा पृथ्वी के मध्य बुद्ध ग्रह का कुछ समय के लिए आना आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ग्रहण दोष माना जा सकता है परन्तु सामाजिक मान्यता मे इसका कोई सर्वमान्य प्रभाव नहीं है। बहरहाल, मर्करी ट्रांजिट को देखने के लिए हमे सबसे पहले एक ऐसी जगह का चुनाव करना था जहां से सूर्यास्त के दौरान बिना किसी अवरोध के सूर्य को देखा जा सके। यह हमारे जेहन मे था कि पिछली बार नीम के पेड़ की वजह से हम वीनस ट्रांजिट के प्रारम्भिक क्षणों को नहीं देख पाये थे। सो इस बार हमने यह गलती न दोहराने का निश्चय किया। इसके लिए हमें ऐसी जगह  चाहिए थी जो शहर से दूर तथा ऊंचाई पर स्थित हो। मणिपर्वत इस प्रयोजन के लिए सर्वश्रेष्ठ जगह थी सो हमने वहीं पर अपने उपकरण समायोजित करने का निर्णय लिया।चूँकि ट्रांज़िट 4:41 पी एम पर शुरू होना था इसलिए हम लोग 4:30 पी एम पर ही मणिपर्वत पहुँच गए।  इस समय सूर्य मे अधिक चमक होने के कारण Nikon P-510 कैमरे से ट्रांज़िट देखना संभव नहीं था सो हमने टेलिस्कोप के द्वारा पर्दे पर प्रतिबिम्ब प्रक्षेपित करके ट्रांज़िट को देखा। हमारे साथ मणिपर्वत घूमने आए कुछ अन्य मेहमान भी जुड़े और उन्होने भी इस घटना का आनंद लिया।
 मर्करी ट्रांज़िट के दौरान महेश, विकास, शौर्य (गोद मे), सुशील, लावान्या, शल्या तथा दो अन्य मेहमान (बायें से दायें)
मेरे साथ विकास, सुशील और महेश बुद्ध परागमन को देखते हुए
सिद्धार्थ बुद्ध परागमन की तस्वीरें लेते हुए
मणिपर्वत से बुद्ध परागमन की प्रथम तस्वीर (09-05-2016; 6:05 पी एम)
जैसे-जैसे शाम ढलती गई, सूर्य की चमक में भी कमी होती चली गई। ऐसे मे सिद्धार्थ का Nikon P-510 कैमरा बड़ा काम आया। उन्होने इससे ट्रांज़िट की कुछ बेहतर तस्वीरे हासिल कीं। ट्रांज़िट की पहली तस्वीर हमे 6:05 पी एम पर प्राप्त हुईं। हम सभी ने कैमरे की डिजिटल स्क्रीन पर भी इस ट्रांज़िट को देखा। कुल मिलाकर हम सभी इस अनूठी घटना के साक्षी बने।

Sunday, 28 October 2012

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आओ करें समय में सैर








मय  में यात्रा करना हमेशा से ही मानव की अभिलाषा रही है। पर क्या आप जानते है कि तारों और ग्रहों को देखने हेतु काम आने वाला दूरदर्शी एक ऐसा प्रकाशिक  यन्त्र है जो हमारी इस अभिलाषा को पूरी कर सकता है। दूरदर्शी उन  खगोलीय पिंडों को देखने के काम आता है जिन्हें नंगी आँखों से देखना संभव नहीं होता। मानो , इसके द्वारा जब हम कोई 100 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर की आकाशगंगा को देखते हैं तो वास्तव में हम उस आकाशगंगा को उसके 100 करोड़ वर्ष पूर्व के रूप में देखते हैं जब उस आकाशगंगा से वह प्रकाश निकला था। उस समय हम मानवों का इस पृथ्वी पर अस्तित्व भी न था। दूरस्थ आकाशगंगाओं के अध्ययन  द्वारा, हम उनके उस रूप को देख सकते है जब ब्रम्हाण्ड युवा था और आकाशगंगाओं का निर्माण हो रहा था। इस प्रकार  दूरदर्शी  हमें समय में पीछे की यात्रा कराता  है।  

चित्र 1. स्वनिर्मित दूरदर्शी 
प्रकाशिक  दूरदर्शी  मुख्यता दो प्रकार के होते हैं - 1) अपवर्तक   तथा 2) परावर्तक  दूरदर्शी 
मेरे द्वारा बनाया गया दूरदर्शी एक अपवर्तक दूरदर्शी है (चित्र.1.)। जिसे आसानी से घर में बनाया और समायोजित किया जा सकता है। इस   दूरदर्शी   के दो प्रमुख अंग होते है  -
1) ऑब्जेक्टिव लेंस 
2) आई पीस 

ये दोनों  धातु या प्लास्टिक के बने खोखले पाइप के दो विभिन्न  सिरों पर व्यवस्थित  होते हैं। इस समायोजन को चित्र 2 के द्वारा समझा जा सकता है। किसी दूरदर्शी  की मूलभूत रचना जैसे उसकी लम्बाई,व्यास इत्यादि इन्हीं पर निर्भर करते हैं। एक शक्तिशाली अपवर्तक  दूरदर्शी  बनाने के लिए  निम्न बातें ध्यान में रखनी जरूरी हैं-

1) ऑब्जेक्टिव लेंस का चयन करते  समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए की वह बड़ी फोकल क्षमता का हो  ताकि वह किसी वस्तु का बड़े से बड़ा प्रतिबिम्ब बना सके। हंलाकि, बाजार में बड़ी फोकल  क्षमता  वाले ऑब्जेक्टिव लेंस की खोज करना एक दुष्कर कार्य जरूर है। ऐसे में धनात्मक क्षमता वाले चश्मे के लेंस  (+0.50 अथवा +0.25)  एक अच्छे विकल्प हो सकते हैं। 

2) बड़ी फोकल क्षमता के साथ ही ऑब्जेक्टिव लेंस का  व्यास भी अधिक होना  चाहिए ताकि उससे होकर अधिक से अधिक प्रकाश गुजरे और चमकीला प्रतिबिम्ब प्राप्त हो सके।

चित्र 2. दूरदर्शी का समायोजन 
3) आई पीस की  फोकल क्षमता एवं  व्यास दोनों ही कम होने चाहिए। आई पीस का कार्य  ऑब्जेक्टिव लेंस के द्वारा बने  प्रतिबिम्ब को आवर्धित करके प्रकाश आँखों तक पहुचना है । इसके लिए  5X , 10X  तथा 15X  पावर  की आई पीस  उपयोग में लायी जा सकती हैं जो बाजार में आसानी से उपलब्ध है।

तो देर किस बात की। आइये जल्दी से जल्दी अपना दूरदर्शी तैयार करके भूतकाल में सैर करें।
                                                                                                    
                                                                                                                          - सिद्धान्त 
                                                                                                                   अक्टूबर 28, 2012 

Tuesday, 19 June 2012

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ट्रांजिट ऑफ़ वीनस

           
ब शुक्र ग्रह पृथ्वी और सूर्य के बीच से गुजरता है, तब वह सूर्य की डिस्क पर एक काले बिंदु के रूप मेंदिखाई देता है इसे ही ट्रांजिट ऑफ़ वीनस कहते है दूरबीन का आविष्कार के बाद अब तक  इस तरह की केवल आठ घटनाये (1631, 1639, 1761, 1769, 1874, 1882, 2004 तथा 2012) ही हुई है जो इसे दुर्लभ बनाती  है। इस खगोलीय घटना का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष  यह भी है कि इसी आधार पर पहली बार प्रमाणिक तौर पर पृथ्वी से शुक्र सहित सूर्य से पृथ्वी तथा अन्य ग्रहों कि दूरियों का शुद्धता से आकलन किया गया और सौर-मंडल के विस्तार को समझा जा सका। 06 जून, 2012 के बाद यह खगोलीय घटना अब 105 वर्षो के बाद 11 दिसम्बर, 2117 में ही देखने को मिलेगी
मेरे टेलिस्कोप द्वारा ली गई वीनस ट्रांजिट का पहली तस्वीर 

           इस अनूठी खगोलीय  घटना को देखने के लिए मैंने सबसे पहले पर्याप्त क्षमता का एक टेलिस्कोप तैयार किया। इस टेलिस्कोप  की सहायता से  कई खगोलीय पिंड जैसे बुद्ध, शुक्र की कलाएं, मंगल, ब्रहस्पति ग्रह समेत उसके उपग्रह, शनि के वलय, चन्द्रमा के क्रेटर एवं पहाड़ समेत कई अन्य तारे देखे जा सकते थे वीनस ट्रांसिट को देखने के लिए अब मेरे पास दो रास्ते थे। पहला ये कि मैं टेलिस्कोप द्वारा सूर्य का एक प्रतिबिम्ब किसी पर्दे पर प्रक्षेपित करूँ या फिर किसी कैमरे (नोकिया-7230 मोबाइल कैमरा) को टेलिस्कोप की आई -पीस से जोड़कर ट्रांसिट के प्रतिबिम्ब हासिल  करूँ  अंततः मैंने  दोनों ही उपायों को अपनाने का निश्चय किया।                       
अयोध्या में वीनस ट्रांजिट का अदभुत नज़ारा

06 जून की सुबह 4 बजकर 45 मिनट से ही मैंने अपने सभी उपकरणों को भली प्रकार समायोजित करना शुरू किया तकरीबन 5:00 बजते-बजते  मेरे कुछ मित्र (अलकेश, दिलीप तथा कामेश) भी मेरे साथ जुड़ गये हालांकि अयोध्या में सूर्य उदय तो 05:26 पर ही हो गया था परन्तु नीम के पेड़ों की वजह से हम सभी ट्रांजिट के  प्रारंभिक क्षणों को नहीं देख पाये लेकिन कोई 02 मिनट के बाद 5 बजकर 28 मिनट पर हमने पेड़ों के पीछे से झांकते सूर्य की ट्रांजिट के साथ पहली तस्वीरे हासिल कीं। परन्तु लम्बे समय तक हम ऐसा नहीं कर सके जैसे -जैसे दिन चढ़ता गया सूर्य की चमक में वृद्धि होती गई चूंकि हमारे पास इस चमक कों कम करने के लिए कोई भी फिल्टर मौजूद नहीं था नतीजतन 5 बजकर 40 मिनट के बाद हमारे द्वारा खींची गई किसी भी तस्वीर में  हम शुक्र ग्रह की छवि नहीं  देख पाए। ऐसे में परदे पर सूर्य के प्रतिबिम्ब को प्रक्षेपित करने की हमारी युक्ति काम आई जिसके फलस्वरूप हमने ना सिर्फ वीनस ट्रांजिट को अंत तक देखा बल्कि उसकी तस्वीरें उतारने में कामयाब भी रहे यह हम सब के  लिए एक कभी न भूलने वाला अनुभव था